पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण
संदर्भ
- ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) नियम, 2026 के उद्देश्य पर्यावरणीय दृष्टि से उचित हैं, किंतु अत्यधिक केंद्रीकरण, कमजोर संघीय संरचना और राज्यों व स्थानीय निकायों के लिए अवास्तविक अनुपालन अपेक्षाओं को लेकर चिंताएँ व्यक्त की जा रही हैं।
SWM नियम, 2026 की आवश्यकता क्यों पड़ी?
- भारत का बढ़ता अपशिष्ट संकट: सरकारी अनुमान और नीतिगत रिपोर्टों के अनुसार:
- भारत प्रतिदिन 1.5 लाख टन से अधिक नगरपालिका ठोस अपशिष्ट उत्पन्न करता है, जिसका बड़ा हिस्सा अनुपचारित या वैज्ञानिक रूप से अप्रबंधित रहता है।
- प्लास्टिक अपशिष्ट और अनुपचारित सीवेज नदियों और तटीय क्षेत्रों को प्रदूषित करते हैं।
- ग्रामीण क्षेत्रों में पैकेज्ड उपभोग के कारण गैर-बायोडिग्रेडेबल अपशिष्ट की तीव्र वृद्धि हो रही है।
- पर्यावरणीय परिणाम: लैंडफिल से मीथेन उत्सर्जन, लीचेट द्वारा भूजल प्रदूषण, अवरुद्ध नालियों से शहरी बाढ़, खुले में जलाने से वायु प्रदूषण, समुद्री अपशिष्ट और माइक्रोप्लास्टिक।
- इस प्रकार, सशक्त अपशिष्ट-प्रबंधन विनियम आवश्यक हो गए।
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 की प्रमुख विशेषताएँ
- स्रोत पृथक्करण: गीला अपशिष्ट, सूखा अपशिष्ट, स्वच्छता संबंधी अपशिष्ट और विशेष देखभाल अपशिष्ट में अनिवार्य पृथक्करण।
- वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रसंस्करण: कम्पोस्टिंग, बायोमीथनेशन, पुनर्चक्रण और अपशिष्ट-से-ऊर्जा प्रणालियों को बढ़ावा।
- लैंडफिल पर निर्भरता में कमी: विरासत कचरे का उपचार, लैंडफिल खनन और परिपत्र अर्थव्यवस्था सिद्धांतों पर ध्यान।
- डिजिटल शासन: केंद्रीकृत रिपोर्टिंग पोर्टल, ऑनलाइन अनुपालन तंत्र, डेटा ऑडिट और निगरानी।
- थोक अपशिष्ट उत्पादकों का विनियमन: होटल, संस्थान, गेटेड सोसाइटी और वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों को जिम्मेदारीपूर्वक अपशिष्ट प्रसंस्करण करना अनिवार्य।
संवैधानिक और संघीय आयाम
- अनुच्छेद 253 और पर्यावरणीय शासन: SWM नियम पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत बनाए गए हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 253 के अनुसार अधिनियमित है।
- अनुच्छेद 253: संसद को अंतर्राष्ट्रीय समझौतों और दायित्वों (जैसे स्टॉकहोम घोषणा, 1972 और पर्यावरणीय संधियाँ) को लागू करने हेतु विधि बनाने का अधिकार देता है।
- यह संघ को सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता, कृषि और स्थानीय शासन से जुड़े विषयों पर भी व्यापक विधायी अधिकार प्रदान करता है।
संबंधित चिंताएँ और मुद्दे
- संघवाद और उपसिद्धांत का सिद्धांत: अपशिष्ट प्रबंधन स्थानीय भूगोल, बसावट पैटर्न, नागरिक व्यवहार, अनौपचारिक अपशिष्ट श्रमिकों, स्थानीय पुनर्चक्रण बाजारों और भूमि उपलब्धता पर अत्यधिक निर्भर करता है। अतः एक समान राष्ट्रीय मॉडल प्रत्येक स्थान कारगर नहीं हो सकता।
- यद्यपि राज्य रणनीतियाँ बना सकते हैं, परंतु ढाँचा मुख्यतः केंद्रीकृत रहता है। इससे राज्यों की स्वायत्तता, नवाचार और संस्थागत सीख सीमित होती है।
- अत्यधिक केंद्रीकरण की समस्या (‘वन-साइज़-फिट्स-ऑल’ दृष्टिकोण): नियम मेगासिटी, छोटे नगर, ग्रामीण पंचायतें, पहाड़ी क्षेत्र (नाज़ुक पारिस्थितिकी, संकरी सड़कें), तटीय बस्तियाँ (समुद्री अपशिष्ट, ज्वारीय बाढ़) और जनजातीय क्षेत्र (कम जनसंख्या, परिवहन कठिनाई) में एक समान अनुपालन ढाँचा लागू करने का प्रयास करते हैं।
- यह प्रशासनिक असंगति उत्पन्न करता है।
- ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए चुनौतियाँ: नियम ग्राम पंचायतों पर जटिल अनुपालन दायित्व लागू करते हैं, जबकि उनकी क्षमता सीमित है।
- मुख्य बाधाएँ हैं: स्वच्छता कर्मियों की कमी, अपर्याप्त वाहन, कमजोर डिजिटल अवसंरचना, सीमित वित्तीय संसाधन और तकनीकी विशेषज्ञता का अभाव।
- फिर भी पंचायतों से अपेक्षा की जाती है कि वे पृथक्करण प्रणाली बनाए रखें, डिजिटल रिपोर्टिंग करें और सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधाओं (MRFs) का प्रबंधन करें।
विभेदित शहरी शासन की आवश्यकता
- मेगासिटी को मजबूत संस्थानों की आवश्यकता: बड़े शहरों को महानगरीय अपशिष्ट प्रबंधन प्राधिकरण, तकनीकी विशेषज्ञता, नागरिक पर्यवेक्षण, निर्वाचित स्थानीय प्रतिनिधित्व और वैज्ञानिक योजना की आवश्यकता है।
- राज्य ‘नवाचार की प्रयोगशालाएँ’ के रूप में: अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों को नीति नवाचार की ‘प्रयोगशालाएँ’ कहा था।
- विभिन्न राज्य विकेन्द्रीकृत कम्पोस्टिंग, अनौपचारिक श्रमिक एकीकरण, उपयोगकर्ता-शुल्क प्रणाली, क्लस्टर अपशिष्ट मॉडल और महिला स्वयं सहायता समूह (SHG) आधारित अपशिष्ट प्रणालियों का परीक्षण कर सकते हैं। सफल मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर दोहराए जा सकते हैं।
- डिजिटल केंद्रीकरण को लेकर चिंताएँ: नियम CPCB रिपोर्टिंग, मानकीकृत प्रारूप, डिजिटल अपलोड और केंद्रीय डेटा ऑडिट को अनिवार्य करते हैं।
- इससे अनुपालन रिपोर्टिंग पर अत्यधिक ध्यान, नौकरशाही भार, ‘डैशबोर्ड शासन’ और स्थानीय जवाबदेही में कमी का जोखिम है।
- वित्तीय चिंताएँ: नियम नगरपालिकाओं और पंचायतों की जिम्मेदारियों को काफी बढ़ा देते हैं।
- लेकिन पूर्वानुमेय अनुदान, सूत्र-आधारित वित्तपोषण और राजस्व समर्थन के बिना कार्यान्वयन कमजोर रह सकता है।
- पर्यावरणीय शासन का न्यायिकरण: कार्यान्वयन विफल होने पर जनहित याचिकाएँ (PILs), न्यायिक निगरानी और सतत आदेश उत्पन्न हो सकते हैं।
- यह पर्यावरणीय सुधार को दीर्घकालिक न्यायिक प्रशासन में परिवर्तित कर सकता है।
- भारत पहले ही वायु प्रदूषण, नदी प्रदूषण और अपशिष्ट-प्रबंधन मामलों में ऐसी प्रवृति देख चुका है।
आगे की राह (सुझाए गए सुधार)
- न्यूनतम राष्ट्रीय मानक: संघ को केवल आधारभूत पर्यावरणीय सुरक्षा मानक निर्धारित करने चाहिए।
- राज्य लचीलापन: राज्यों को स्थानीय वास्तविकताओं के अनुरूप कार्यान्वयन मॉडल तैयार करने चाहिए।
- सशक्त स्थानीय निकाय: नगरपालिकाओं और पंचायतों को प्रशासनिक स्वायत्तता, तकनीकी कर्मचारी एवं स्थानीय योजना शक्तियाँ मिलनी चाहिए।
- पूर्वानुमेय वित्तपोषण: अपशिष्ट प्रबंधन को समर्पित अनुदान, प्रदर्शन-आधारित समर्थन और दीर्घकालिक वित्तीय तंत्र मिलना चाहिए।
- नागरिक जवाबदेही: वार्ड समितियों, ग्राम सभाओं और सार्वजनिक प्रकटीकरण प्रणालियों को सुदृढ़ करना चाहिए।
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